आंकी का निलेश
आँखों में आंसू झलक उठा था !
कितनी दूर है मंजिल ये सोच कर तड़प उठा था !
काली घटा रोक लेती हैं मुझे मोहब्बत के मेले में !
निकलता हूँ जब भी घर से रोना आ जाता है अकेले में !
लेकर पैगाम भेजो अपने किसी कबूतर को !
शादी के बंधन में बांध दो मेरे प्रश्नो और अपने उत्तर को !
आँखों में आंसू झलक उठा था !
कितनी दूर है मंजिल ये सोच कर तड़प उठा था !
काली घटा रोक लेती हैं मुझे मोहब्बत के मेले में !
निकलता हूँ जब भी घर से रोना आ जाता है अकेले में !
लेकर पैगाम भेजो अपने किसी कबूतर को !
शादी के बंधन में बांध दो मेरे प्रश्नो और अपने उत्तर को !
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Thank you for Comment Nilesh Nishakar